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क्यो बदल रहे गांव इस सदी में

क्यो बदल रहे गांव इस सदी में

वह खेत कि हरियाली
अहले सुबह दिखाई देती थी
वह सूरज कि लाली
रोज किसान जाते थे खेत की ओर
थामे हाथों में बैलो का ओ डोर
लगी रहती थी उनमे जल्दी जाने की होड़
खुशियाली छा गई थी हर एक ओर
ना होता था मैं गांव का सुबह कभी भी बोर

देखता रहता था डूबके एक कोने में
बहुत कुछ खोया मैं सोने में
हर पल सुकून मिलता था गांव में
वह मंदिर के पास पीपल के छाव में

अब मैं ना जाऊंगा गांव छोड़कर शहर
वहा होती है पढ़ाई की लहर
हर तरफ फैला है प्रदूषण की कहर
वहाँ की सुबह दिखाई देती हैं दोपहर

बदल रहा गांव अब शहर में
मिल रहा तो भी प्रदूषण के कहर में
न ही चिड़िया चहचहाती है कण में
न ही नाचता मोर अब वन में
न ही होती ह हिलोरे अब नदी में
क्यो बदल रहा गांव इस सदी में

—विशाल राज भारद्वाज
सुर्यनगर इस्माईलपुर, वैशाली

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