कुछ इस तरह

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हम बिखरगे
कुछ इस तरह
कि तुम संभाल भी न पाओगे।
हम टूटेंगे
कुछ इस तरह
तुम जोड़ भी न पाओगे।
हम लिखेंगे
कुछ इस तरह
कि तुम समझ भी न पाओगे।
हम सुनाएंगे दास्तां
कुछ इस तरह
कि तुम कुछ कह कर भी
न कह पाओगे।
हम जाएंगे इस जहां से
कुछ इस तरह
कि तुम्हारे बुलाने पर भी
कभी लौटकर न आएंगे।।

मौलिकता प्रमाण पत्र
मेरे द्वारा भेजी रचना मौलिक तथा स्वयं रचित है जो कहीं से भी कॉपी पेस्ट नहीं है।

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राजीव डोगरा ‘विमल’
युवा कवि एवं लेखक
(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल ठाकुरद्वारा,
कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश।

नोट: इस रचना को कलमकार ने स्वरचित एवं मौलिक बताया है और वाणीश्री न्यूज पर पोस्ट करने हेतु प्रस्तुत किया है। इस पोस्ट में रचनाकार ने अपने व्यक्तिगत विचार प्रकट किए हैं। पोस्ट में पाई गई कोई चूक या त्रुटियां रचनाकार की है और वाणीश्री न्यूज उसके लिए किसी तरह का जिम्मेदार नहीं है।

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