PoetryVishal Bhardwaj
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पहली बरसात

मुझे याद है वह बात

साल की थी वह पहली बरसात

बुंद-बुंद कर टपक -टपक

कर गिर रही थी पानी

सब जानवर कर रहे थे कोलाहाल

साथ खुश थे सारे प्रंक्षि-प्राणि

नाच रहे थे जंगल में मोर

सिंधू की लहरे भी कर रहे थे हिलोर

समय थी दोपहर की•••••••

बात थी शहर की•••••••

मैं बैठा हुआ था आशियाने में

सोच रहा था सही मायने में

क्या खुशी ह भींग जाने में

या चुप चाप घर में बैठ जाने में

मैं देख रहा था छत की ओर

सही में मैं हो रहा था बोर

मैने सुना एकएक शोर

छत पे दिखी नाचती हुई मोर

वह थी मेरे घर के बगल की

कपड़ा पहने हुई थी हल्के कलर की

ऊपर बदल थी कर्की

नीचे भिंग रही थी वह लड़की

चंद मिनटों बाद, चली गई वो मोर

बंद हो गई, ओ शोर

सनन्टा छा गई, हर एक ओर

फिर मेरे नौकर ने चिल्लाया

साहब खत्म हो गई बरसात

मैं भी सोचा शायद यही होगी बात

नही दिखी ओ मोर

निगाहें टीकी हुई थी उसी ओर

अब मैं ना हो रहा था बोर

Kuiki दिखी थी छत पर

नाचती हुई प्यारी सी मोर।

— विशाल राज भारद्वाज

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