पेड़ पौधों की घटती संख्या के कारण बंदरों का झुंड उत्तर बिहार के लिए बन रहा काल

0
8
Advertisement

पेड़ पौधों की घटती संख्या के कारण बंदरों का झुंड उत्तर बिहार के लिए काल बन गया है। छपरा, सीवान, गोपालगंज, मोतिहारी, बेतिया समेत नेपाल के तराई के इलाके वाले जिलों में बंदरों ने लोगों का जीना दूभर कर रखा है। पहले यह बंदर के बगीचों में आश्रय पाते थे जहां सालों भर इन है विभिन्न पेड़ पौधों से खाने पीने की चीजें मिल जाया करती थी।

महुआ का पेड़ इन का सबसे बड़ा आश्चर्य हुआ करता था पर पैरों की घटती संख्या नहीं बन इन बंदरों को गांव के बगीचे से गांव में शिफ्ट कर दिया। पहले तो यह बंदर घर के छत ऊपर नजर आते थे। इधर उधर धमाचौकड़ी करते थे पर अब यह पूरी तरह से आक्रामक हो गए है। खाने पीने की जरूरत पूरा करने के लिए अब यह लोगों पर हमला करते हैं। घरों में घुस जाते हैं। छोटे बच्चों को नुकसान पहुंचाते हैं ।घर के किचन में रखी वस्तुओं को लेकर भाग जाते हैं। इनका झुंड गांव-गांव में 500 से 1000 की संख्या में हैं।

Advertisement

सबसे ज्यादा परेशानी छपरा और गोपालगंज के लोगों को है। छपरा से लेकर गोपालगंज तक रेलवे लाइन के किनारे के पेड़ और स्टेशन इनके आसरा हुआ करते थे पर लॉकडाउन के कारण ट्रेनों का परिचालन प्रभावित हुआ तो यह बंदर भी गांव की तरफ शिफ्ट कर गए। स्थिति इतनी विकराल है कि आए दिन कोई न कोई घटना घटती रहती है इलाके के जनप्रतिनिधियों तक से लोगों ने अपील की कि वन विभाग के सहयोग से इन बंदरों को यहां से दूसरे जगह शिफ्ट कराया जाए। वन विभाग भी इन बंदरों को पकड़ने में कोई रुचि नहीं दिखाता है।

बंदरों के साथ ही साथ उत्तर बिहार में जंगली सूअर, नीलगाय भी काल बनकर आए बंदरों के कारण घर के इर्द-गिर्द उगने वाली सब्जियां अब किसान नहीं उगाते हैं। वहीं खेतों में नीलगाय और जंगली सूअरों ने दलहन, तिलहन और मकई की फसल को भारी नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है। पहले यह बंदर लोगों से डरते थे पर यह आप लोगों पर हमला कर देते हैं। इन की प्रजनन क्षमता काफी ज्यादा है। इस कारण से इनकी संख्या में तेजी से इजाफा होते जा रहा है। अगर समय रहते बंदरों के समस्या पर कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया तो यह आने वाले समय में और ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं।

Advertisement

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here