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जहां भगवान विष्णु के चरण के होते हैं साक्षात दर्शन

आलेख: अनूप नारायण सिंह। विश्व में मुक्तिधाम के रूप में विख्यात पितरों के श्राद्ध अौर तर्पण के लिए #बिहार के #गया धाम से श्रेष्ठ कोई दूसरा स्थान नहीं है। मान्यता के अनुसार गया में भगवान #विष्णु पितृ देवता के रुप में निवास करते हैं। कहा जाता है कि गया में श्राद्ध कर्म करने के पश्चात भगवान विष्णु के दर्शन करने से व्यक्ति को पितृ, माता अौर गुरु के ऋण से मुक्ति मिल जाती है। यहां अति प्राचीन #विष्णुपद मंदिर स्थित है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के पदचिन्ह आज भी मौजूद हैं। ये मंदिर #फल्गु नदी के किनारे स्थित है। इसे धर्मशीला के नाम से जाना जाता है। इनके दर्शन से व्यक्ति को सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

काले पत्थर का यह वर्तमान सुन्दर और चित्ताकर्षक मन्दिर प्रातः स्मरणीया इन्दैार की महारानी अहिल्या बाई का बनाया हुआ है। वर्तमान विष्णुपद मन्दिर का निर्माण काल १७८० ई0 है। मंदिर की उँचाई १०० फीट है यह मंदिर गया स्टेशन से २ कि.मी. की दुरी पर है। मंदिर के अंदर गयासुर की प्रार्थना के अनुसार भगवान विष्णु का चरण चिन्ह है। चरण चिन्ह १३ ईच का है और उँगलिया उतर की ओर है।

मंदिर का ऊपरी भाग गुम्बजाकार है जो देखने में बहुत सुन्दर मालूम होता है। मंदिर के ऊपर शिखर पर बालगोविन्द सेन नामक एक गयापाल की चढ़ाई हुई १ मन सोने की ध्वजा फहराती है। मंदिर के भीतरी भाग में चांदी से आवेष्ठित एक अष्ट-कोण कुण्ड में विष्णु का चरण चिन्ह है। मंदिर के सामने के भाग में एक सभा मण्डप है। चरण के ऊपर एक चांदी का छत्र सुषोभित है। यह छत्र बालगोविन्द सेन का दान है और विष्णुपद का चांदी का आध्र्य भी उन्हीं का दान है। मंदिर के सभा-मण्डप मे और उसके बाहर दो बड़े घंटे लटक रहे हैं। यहां पर एक विचित्र बात का उल्लेख आवशयक प्रतीत होता है और वह यह कि सभा – मण्डप की छत से पानी की बून्द टपका करती है। जन-श्रुति के अनुसार जिस तीर्थ का नाम हृदय में रखकर आप हाथ पसारिये आपके हाथ में दो एक बून्द पानी जरूर गिरेगी। मंदिर में प्रतिदिन रात्रि में भगवद्चरण का मलयागिरी चन्दन से श्रृंगार होता है। रक्त चन्दन से चरण चिन्ह पर शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि अंकित किए जाते हैं। पुण्यमास में जैसे वैशाख, कार्तिक आदि में श्रृंगार पश्चात् विष्णु सहस्त्रनाम सहित विष्णु चरण पर तुलसीदल अर्पण दर्शनीय शोभा है।

सच बात तो यह है कि गया में पिण्डदान से पितरों की अक्षय तृप्ति होती है। एक कोस क्षेत्र गया-सिर माना जाता है, ढाई कोस-तक गया है और पाँच कोस तक गया-क्षेत्र है। इसी के मध्य में सब तीर्थ आ जाते है। इस मंदिर के निर्माण के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिल पाई लेकिन कहा जाता है कि श्रीराम अौर माता सीता इस स्थान पर अवश्य आए थे। भगवान विष्णु के पदचिन्ह मंदिर के केंद्र में स्थित हैं। हिंदू धर्म के अनुसार ये पदचिन्ह उस समय के हैं जब भगवान विष्णु ने गयासुर दैत्य की छाती पर पैर रखकर उसे धरती के अंदर धकेल दिये थे। विष्णुपद पदचिन्ह के चारों अौर चांदी से जड़ा बेसिन है। मंदिर के अंदर एक अविनाशी बरगद का वृक्ष है, जिसे अक्षय वट कहा जाता है। इस वृक्ष के नीचे मृत व्यक्ति की अंतिम रस्मे की जाती है।

पुराणों में भी गया में पितरों का श्राद्ध करने का उल्लेख मिलता है। पुराणों के अनुसार #गयासुर नामक राक्षस भगवान से वर प्राप्त करके उसका दुरुपयोग कर देवताअों को परेशान करना शुरु कर दिया। गयासुर के अत्याचर से दुखी देवताअों ने भगवान विष्णु की शरण में जाकर उनसे प्रार्थना की थी कि वे उन्हें गयासुर के अत्याचार से मुक्ति दिलाएं। देवताअों की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने अपना दायां पैर उसके सिर पर रख कर उसे धरती के अंदर धकेल दिया। राक्षस को जमीन के अंदर धकेलने के बाद भगवान विष्णु के पदचिन्ह के निशान सतह पर ही रह गए जो आज भी मौजूद हैं। बाद में भगवान विष्णु ने गया के सिर पर एक पत्थर रखकर उसे मोक्ष प्रदान किया।

गया के विष्णुपद मंदिर में वह पत्थर आज भी मौजूद है। भगवान विष्णु द्वारा गयासुर का वध करने के बाद उन्हें गया तीर्थ में मुक्ति दाता माना गया। कहा जाता है कि गया में श्राद्ध अौर तर्पण करने से व्यक्ति को स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। गया से लगभग आठ किलोमीटर की दूर प्रेतशिला में पिंडदान करने से पितरों के उद्धार होता है।

विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु का चरण चिह्न महर्षि #मरीचि की पत्नी माता धर्मवत्ता की शिला पर है। राक्षस गयासुर को स्थिर करने के लिए धर्मपुरी से माता धर्मवत्ता शिला को लाया गया था, जिसे गयासुर पर रख भगवान विष्णु ने अपने दाहिने पैर से दबाया। इसके बाद शिला पर भगवान के चरण चिह्न है। समूचे विश्व में विष्णुपद ही एक ऐसा स्थान है, जहां भगवान विष्णु के चरण का साक्षात दर्शन कर सकते हैं।

यहां चरण के स्पर्श से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। वहीं यह मंदिर सोने को कसने वाला पत्थर कसौटी से बना है, जिसे जिले के अतरी प्रखंड के पत्थरकट्‌टी से लाया गया था। इस मंदिर के सभा मंडप में ४४ स्तंभ हैं। ५४ वेदियों में से १९ वेदी विष्णपुद में ही हैं, जहां पर पितरों के मुक्ति के लिए पिंडदान होता है। यहां सालों भर पिंडदान होता है।

अरण्य वन बना सीताकुंड विष्णुपद मंदिर के ठीक सामने फल्गु नदी के पूर्वी तट पर स्थित है सीताकुंड। यहां स्वयं माता सीता ने महाराज #दशरथ का पिंडदान किया था। पौराणिक काल में यह स्थल अरण्य वन जंगल के नाम से प्रसिद्ध था। भगवान #श्रीराम, माता #सीता के साथ महाराज दशरथ का पिंडदान करने आए थे, जहां माता सीता ने महाराज दशरथ को बालू फल्गु जल से पिंड अर्पित किया था, जिसके बाद से यहां बालू से बने पिंड देने का महत्व है।

१८वीं शताब्दी में महारानी अहिल्याबाई ने मंदिर का कराया था जीर्णोद्वार विष्णुपद मंदिर के शीर्ष पर ५० किलो सोने का कलश और ५० किलो सोने की ध्वजा लगी है। गर्भगृह में ५० किलो चांदी का छत्र और ५० किलो चांदी का अष्टपहल है, जिसके अंदर भगवान विष्णु की चरण पादुका विराजमान है। इसके अलावे गर्भगृह का पूर्वी द्वार चांदी से बना है। वहीं भगवान विष्णु के चरण की लंबाई करीब ४० सेंटीमीटर है। बता दें कि १८वीं शताब्दी में महारानी अहिल्याबाई ने मंदिर का जीर्णोद्वार कराया था। पर यहां भगवान विष्णु का चरण सतयुग काल से ही है।

विष्णुपद कथा::

गया तीर्थ में पितरों का श्राद्ध और तर्पण किए जाने का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। पुराणों के अनुसार, गयासुर नाम के एक असुर ने घोर तपस्या करके भगवान से आशीर्वाद प्राप्त कर लिया। भगवान से मिले आशीर्वाद का दुरुपयोग करके गयासुर ने देवताओं को ही परेशान करना शुरू कर दिया। गयासुर के अत्याचार से दु:खी देवताओं ने भगवान विष्णु की शरण ली और उनसे प्रार्थना की कि वह गयासुर से देवताओं की रक्षा करें। इस पर विष्णु ने अपनी गदा से गयासुर का वध कर दिया। बाद में भगवान विष्णु ने गयासुर के सिर पर एक पत्थर रख कर उसे मोक्ष प्रदान किया।

गया में आज भी विष्णुजी का वह चमत्कारी पत्थर
गया के प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर में वह पत्थर आज भी मौजूद है। भगवान विष्णु द्वारा गदा से गयासुर का वध किए जाने से उन्हें गया तीर्थ में मुक्तिदाता माना गया। कहा जाता है कि गया में यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण और पिंड दान करने से मनुष्य को स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। वहीं गया शहर से करीब आठ किलामीटर की दूरी पर स्थित प्रेतशिला में पिंडदान करने से पितरों का उद्धार होता है।

प्रेतशिला पर्वत का विशेष महत्व है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इस पर्वत पर #पिंडदान करने से अकाल मृत्यु को प्राप्त पूर्वजों तक पिंड सीधे पहुंच जाता है जिनसे उन्हें कष्टदायी योनियों से मुक्ति मिल जाती है। शास्त्रों के अनुसार पिंडदान के लिए तीन जगहों को सबसे विशेष माना गया है। पहला है #बद्रीनाथ जहां ब्रह्मकपाल सिद्ध क्षेत्र में पितृदोष मुक्ति के लिए तर्पण का विधान है। दूसरा है #हरिद्वार जहां नारायणी शिला के पास लोग पूर्वजों का पिंडदान करते हैं और तीसरा है #गया।

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